पाप - पुण्य (हिंदी)
by Satguru Shri Wamanrao Pai
पाप-पुण्य के बारे में जनमानस में अजीब सी कल्पनाएँ पाई जाती हैं। लोग किसी चीज को पाप कहते हैं तो किसी भी चीज को पुण्य समझ बैठते हैं। जिस तरह कोई वस्तु लगातार इस्तेमाल से छीजकर बेकार हो जाती है; ठीक उसी तरह पाप-पुण्य शब्दों का लगातार प्रयोग आज अर्थहीन बन चुका है। परंतु सद्गुरु जी ने इस ग्रंथ में पाप-पुण्य की संकल्पनाओं का तार्किक विश्लेषण दृढ़तापूर्वक प्रतिपादित किया है। साथ ही पाप-पुण्य हमारे जीवन से किस तरह जुड़े हुए हैं, पुण्य की प्राप्ति कैसे करें, पाप से कैसे दूर रहे आदि प्रश्नों का समाधान करते हुए पाप-पुण्य के बारे में प्रचलित गलत धारणाओं को दूर किया है।
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